Tuesday, September 8, 2009

आंतकवाद पर हावी मोहब्बतवाद


आपको यह जानकर हैरानी होगी कि , हमारे देश में मौतें आंतकवाद से ज्यादा मोहब्बतवाद के कारण होती है । मोहब्बत के लिए मौत का सजा देना आम होता जा रहा है ,तभी तो पिछले महीने हरियाणा के हिसार जिलें के सुबाना गांव में एक युवा जोडे को लड़की के घरवालों ने पीट पीट कर मार डाला ,वहीं मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में भी एक प्रेमी जोड़े को बीच चैराहे पर लड़की के भाई ने काट डाला था ।इस तरह हमारे देश में लाखों लोगो की जान जा चुकी है । हिसाब रखने वाले तो गिनकर तक बता दिया है । आंकडो के अनुसार इश्क़ विश्क मंे जान देने वालों की तादात ,आंतकवाद से वजह से जान गंवाने वालों से थोड़ी बहुत ज्यादा नहीं ,कई गुना ज्यादा है । आंकडो पर नजर डाली जाए तो सन 2006 में देश भर में जो कुल 36 हजार लोग मारे गए , उनमें से 2547 प्यार के चक्कर में ही मारे गए थे ,जबकि आंतकवाद के चक्कर में केवल 894 निकले । यह किस्सा केवल 2006 का ही नहीं ,यह तो हर साल की कहानी है । हमारे यहां जिस तरह आंतकवाद का डर बताया जाता है , उससे ज्यादा डर तो मोहब्बतवाद से लगना चाहिए। मजे की बात यह है कि इश्क विश्क में जान देन वाले में आंध्र प्रदेश आगे निकल गया है । उनका स्कोर 405 का रहा यानी मोहब्बत के शहीदों में हर छटा आदमी आंध्रप्रदेश का ही था । 279 संख्या के साथ यूपी दूसरे व 233 अंको के साथ मप्र तीसरे स्थान पर है । हालांकि आंध्रप्रदेश इस मामले में आगे निकल गया हो ,उसमें हरियाणा तेजी से बढ़ रहा है वहां आज ही एक प्रेमिका को गांव वालों ने मौत के घाट उतार दिया । वहीं आंतकवाद के कारण जम्मू कश्मीर सबसे आगे है , जहां पर 2006 में 1861 लोग मारे गए , दूसरे नंबर पर 152 संख्या के साथ मणिपुर रहा और तीसरे नंबर पर 145 अंको के साथ झारखंड है।यानी हमारा देश में दो तरह के आंतको का बोलबाला है । दोनो आंतको के अलग अलगा इलाकों में जोर है । फिर भी मोहब्बतविरोधी आंतक की चुनौती ज्यादा बड़ी है। पर अफसोस की बात यह है कि हमारी सरकार आंतवाद से लड़ने के लिए तैयार है परंतु इस नरभक्षी आंतक से लड़ने के लिए नहीं ।

Sunday, August 2, 2009

कलयुग का स्वयंवर खत्म



चलो राखी की नौंटकी खत्म तो हुई , आखिरकार ने राखी ने कनाडा के बिजनेसमैन इलेश को जीवनसाथी चुन ही लिया । पिछले दो माह से चल रही नौटंकी पर विराम लग गया । दर्शको के बीच हमेशा चर्चा में रहना राखी केा खुब आता है, वैसे अभी राखी ने शादी नहीं की । अब देखना ये है कि आगे शादी को मीडिया कैसे दिखाता है ।

क्या हिन्दुस्तान बदल रहा है ?


इमरान हाशमी को पाली हिल के नजदीक निबाना कोओपरेटिव सोसाइटी ने फ्लैट देने से मना क्या कर दिया ,मीडिया को मसाला मिल गया , मिले भी क्यो ना ,सेलिब्रेटी जो है परंतु उनका क्या जो आम इंसान है ,चिंता इमरान हाशमी को घर ने मिलने की नहीं है ं, चिंता लाखों आम लोगों की है , जिनकी समस्याओं पर कोई गौर नहीं करता है । कोई मांसाहारियों को घर देना नही चाहता तो कोई दलितों को घर नहीं देता । एक वाक्या याद आ रहा है , एक छोटी जाति दोस्त के लिए रायपुर में घर ढूढंने में बड़ी समस्याओं को सामना करना पड़ा था ,कई मकान मालिकों ने केवल निम्न जाति होने को कारण घर देने से मना ही कर दिया , किसी ने कहा तो हम तो पंडित है ,घर नही दे सकते । दुख तो इस बात यह है , यदि सेलिब्रेटी के साथ ऐसा होता है तो चर्चा व चिंता का विषय हो जाता है , चिंता तब नहीं होती ,जब सरकार की अनेकों योजना के तहत आम लोगों को घर नहीं मिलता है । अभी भी देश के कई झुग्गीवासियों को सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला । इमरान हाशमी तो सुपर स्टार है , नया घर खरीद लेंगे । असल चिंता यह है कि सरकार ऐसी समस्या के प्रति कितनी संजीदा है ।
अब सवाल ये है , क्या वाकई हिंदुस्तान बदल रहा है ? शायद नहीं !

Wednesday, July 29, 2009

ये कैसी जल्दी ?

मु़झे टीवी प़त्रकारिता े फील्ड में आए महज एक साल हुए हैं। दास्तों एक साल से मन में एक ही सवाल घुम रहा है ,आखिर ये कैसी जल्दी है ? जल्दी के चक्कर में कई बार गलत खबर ही ब्रेक कर दी जाती है , शायद ये सब टी आर पी के कारण होता है ,पर ऐसी टी आर पी का क्या मतलब ? कई बार अपने प्रतियोगी चैनल के पीछे करने की होड में विजुअल तक गलत आंन एयर कर दिए जाते है । न्यूज रूम के अंदर एक ही आवाज गुंजती है , काटो३ काटो३ काटोदोस्तों जो भी गडबड होता है काटो काटो के कारण ही होता है । मेरा मानना है कि सनसनी से ज्यादा समझ जरूरी है , प्रतियागिता इतनी ज्यादा बढ गई है कि कई बार ये समझ में नही आता है कि ,आखिर हम क्या दिखा रहा है । खबरों के जल्दी दिखाने से बेहतर होगा कि हम खबरों को सही आकलन कर दिखाएं , सनसनी फैलाने से क्या मिल रहा है ं। ये बात सही है कि बाजारवाद के इस युग में पत्रकारिता प्रभावित हुई , परंतु पत्रकारिकता के जीवित रखना है तो खबरों के साथ कोई समझौतानकरें । पत्रकारिता का दुर्भाग्य है कि आजकल इन मीडियों संस्थानों की बागडोर मीडिया के दलालों के हाथ में है , जिनका मकसद केवल पैसा कमाना है ।यदि ऐसा ही चलता रहा तो कुछ सालों बाद प़त्रकारिता खत्म हो जाएगी,खबरों का समझौता होता रहेगा और दलालों के झोली भरती रहेगी ।

ये कैसी जल्दी ?

मु़झे टीवी प़त्रकारिता े फील्ड में आए महज एक साल हुए हैं। दास्तों एक साल से मन में एक ही सवाल घुम रहा है ,आखिर ये कैसी जल्दी है ? जल्दी के चक्कर में कई बार गलत खबर ही ब्रेक कर दी जाती है , शायद ये सब टी आर पी के कारण होता है ,पर ऐसी टी आर पी का क्या मतलब ? कई बार अपने प्रतियोगी चैनल के पीछे करने की होड में विजुअल तक गलत आंन एयर कर दिए जाते है । न्यूज रूम के अंदर एक ही आवाज गुंजती है , काटो३ काटो३ काटोदोस्तों जो भी गडबड होता है काटो काटो के कारण ही होता है । मेरा मानना है कि सनसनी से ज्यादा समझ जरूरी है , प्रतियागिता इतनी ज्यादा बढ गई है कि कई बार ये समझ में नही आता है कि ,आखिर हम क्या दिखा रहा है । खबरों के जल्दी दिखाने से बेहतर होगा कि हम खबरों को सही आकलन कर दिखाएं , सनसनी फैलाने से क्या मिल रहा है ं। ये बात सही है कि बाजारवाद के इस युग में पत्रकारिता प्रभावित हुई , परंतु पत्रकारिकता के जीवित रखना है तो खबरों के साथ कोई समझौतानकरें । पत्रकारिता का दुर्भाग्य है कि आजकल इन मीडियों संस्थानों की बागडोर मीडिया के दलालों के हाथ में है , जिनका मकसद केवल पैसा कमाना है ।यदि ऐसा ही चलता रहा तो कुछ सालों बाद प़त्रकारिता खत्म हो जाएगी,खबरों का समझौता होता रहेगा और दलालों के झोली भरती रहेगी ।

Tuesday, July 28, 2009

सच का नाटक

आपके षादी से पहले कितनी महिलाओं के साथ षारिरिक संबंध रहें हैं?
क्या आप कच्ची उम्र में ही गर्भवती हो गई थी ?
आपको लग रहा है ये क्या लिख रहा है , दोस्तों कुछ इसी तरह के सवाल पुछे जा रहे है ‘सच का सामना ’रिएलिटी षो में । क्या आपने कभी सोचा है , इस तरह के सवाल पुछने का मकसद क्या होगा ? इस तरह के सवाल से लोगों का घर ही बर्बाद होगें। न जाने , विदेषों में ही कितनों के घर तोड़ने के बाद अब ये षो भारत में आया । आखिर ये सवाल हैं कि क्या से सचमुच ‘सच का सामना ’है? सच का माने तो यंे षो अमेरिका का है, कुछ अमीरजादों का है ,कुछ असामजिक लोगों को है ,पर सवाल ये है कि इसका आधे भारत से क्या वास्ता है जो गरीब है । हमारा दुर्भाग्य है कि चंद पैसों के चक्कर में हम सभ्य समाज का खराब करने का प्रयास कर रहे है ,नइ्र्र पीढी को भेट कर रहे है ।
खुद अमेरिका में इस षो की आलोचना हुई है ,यहां कई प्रतिभागियों के घर टूट चुकें है । ये हिंदुस्तान है ,अमेरिका या युरोप नहीं ,जो इस तरह के घटिया षो प्रसारित किया जाएं। जीवन में सच कई तरह के होते है ,परंतु ऐसे सच का क्या मतलब जिससे जीवन ही बर्बाद हो जाए । यह भी एक विडंबना है कि देष के नीति निर्धारक रोक की मांग तब करते है जब यह कार्यक्रम या घटना घर घर तक पहुंच चुका होता है ।सरकार को प्रसारण पूर्व ही इस पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए था। वैसे भी भारतीय संविधान की धारा 19 के तहत सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वंत़त्रता है साथ ही वह भारत की संप्रभुता ,अंखडता , राज्य की सुरक्षा संरक्षित करने के लिए बाध्य भी करती है । इस लिहाज से सदाचार व सभ्य आचरण बिगाडने के लिए इस कार्यक्र्रम को दोशी ठहराया जा सकता है ,चाहे इसमें कितना ही सच समाहित हो । यदि भारत सरकार को जरा सा भी भारतीयता का अहसास है तो तुरंत ही इस ‘सच का सामना‘ या फिर सच का नाटक पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए।

Friday, June 5, 2009

रीयल लाइफ में विवाह

आपको यह जानकार की खुशी होगी कि , सूरज बड़जात्या की फिल्म विवाह का वो नजार भोपाल में दिखने को मिला जिसमें शाहिद कपूर इस फिल्म की हीरोइन से अस्पताल में विवाह करता हैं।इस शादी में न तो मंडप सजा, ना बैंड बाजे बजे ।दरअसल विवाह के पहले , दुल्हन बीमार पड़ गई । तय मुहूर्त पर निकाह के लिए दूल्हे राजा बारात लेकर अस्पताल पहंुचे । और निकाह आई सी यू वार्ड में पढा गया । भोपाल के बरखेड़ा पठानी इलाके में रहने वाली नाज के घर आज बारात आना थी। पिछले कई दिनों से शादी की तैयारियां चल रही थीं , लेकिन दो दिन पहले नाज बुरी तरह बीमार पड़ गई , उसे राजधानी के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है । नाज के बीमार होने के कारण आ सी यू में सारी रस्में हुई । मौलवी के कहने पर दुल्हा दुल्हन ने जैसे ही कहा निकाह कबूल जा पहुचा तो बाराातियों और चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ गई ।